जल है तो जीवन है, प्रकृति है तो भविष्य है!   पहाड़ों का सीना छलनी, हरियाली पर धूल का पहरा—घाटरी और अगावली में खनन से ग्रामीणों की जिंदगी पर संकट!

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भरतपुर। जल है तो जीवन है, जीवन है तो प्रकृति है और प्रकृति सुरक्षित है तो हमारा भविष्य सुरक्षित है। लेकिन जब विकास के नाम पर पहाड़ियों का सीना छलनी किया जाए, पेड़ों को काटा जाए, धरती को गहरे गड्ढों में तब्दील कर दिया जाए और गांवों के आसपास क्रेशर लगाकर धूल का गुबार फैलाया जाए, तो सवाल उठना लाजिमी है—क्या यही विकास है या प्रकृति के साथ खुला खिलवाड़?   भरतपुर जिले के घाटरी और अगावली गांवों के आसपास खनन गतिविधियों और क्रेशर संचालन को लेकर ग्रामीणों की चिंताएं लगातार सामने आ रही हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि गांवों के नजदीक खनन और क्रेशर से उड़ने वाली धूल-मिट्टी ने उनके जीवन को मुश्किल बना दिया है। जिस हवा में उन्हें सांस लेकर स्वस्थ जीवन जीना चाहिए, उसी हवा में धूल घुलने की शिकायतें हैं। ऐसे हालात में बच्चों, बुजुर्गों और अन्य ग्रामीणों के स्वास्थ्य को लेकर गंभीर चिंता पैदा हो रही है।   पहाड़ खोखले हो रहे हैं, मकानों में दरारें और खेतों पर धूल की चादर!   ग्रामीणों के अनुसार, खनन के दौरान होने वाले विस्फोटों से आसपास के मकानों में दरारें पड़ने की आशंका और शिकायतें सामने आई हैं। बारिश का पानी इन दरारों में पहुंचने से मकानों की मजबूती को लेकर लोगों की चिंता और बढ़ जाती है। वहीं, खेतों पर जमने वाली धूल फसलों की वृद्धि और उत्पादन को प्रभावित कर सकती है। किसान दिन-रात मेहनत करके फसल तैयार करते हैं, लेकिन यदि धूल और प्रदूषण के कारण उनकी मेहनत पर संकट खड़ा हो, तो उनके नुकसान की भरपाई कौन करेगा?   इंसानों के साथ बेजुबान पशुओं की जिंदगी भी खतरे में!   गांवों के आसपास खनन से बने खुले और गहरे गड्ढे पशुधन के लिए भी खतरा बन सकते हैं। ग्रामीणों की शिकायत है कि ऐसे गड्ढों में पशुओं के गिरने और जान जाने की घटनाओं का खतरा बना रहता है। पहाड़ियों और पेड़-पौधों का नुकसान केवल प्राकृतिक सुंदरता का नुकसान नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन, मिट्टी, जलस्रोतों और जीव-जंतुओं के जीवन से भी जुड़ा सवाल है।   क्या ग्रामीणों को स्वच्छ हवा और सुरक्षित जीवन का अधिकार नहीं?   संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। न्यायिक व्याख्याओं में स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार भी इससे जुड़ा है। ऐसे में सवाल है कि यदि खनन और क्रेशर संचालन के कारण ग्रामीणों के स्वास्थ्य, मकानों, खेती और पशुधन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, तो जिम्मेदारी कौन तय करेगा?   प्रशासन और संबंधित विभागों को चाहिए कि वे घाटरी और अगावली में खनन की निर्धारित सीमाओं, पर्यावरणीय स्वीकृतियों, प्रदूषण नियंत्रण के उपायों, विस्फोटों के प्रभाव और सुरक्षा मानकों की निष्पक्ष जांच कराएं। नियमों का उल्लंघन मिलने पर नियमानुसार कार्रवाई हो और प्रभावित ग्रामीणों की शिकायतों का समाधान किया जाए।   विकास जरूरी है, लेकिन विनाश की कीमत पर नहीं!   पहाड़ केवल पत्थरों का ढेर नहीं, प्रकृति की धरोहर हैं। पेड़ केवल हरियाली नहीं, जीवन की सांस हैं। गांव केवल नक्शे पर बनी बस्तियां नहीं, हजारों परिवारों का संसार हैं। यदि विकास की दौड़ में ग्रामीणों की सेहत, किसानों की फसल, पशुधन की सुरक्षा और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य ही दांव पर लग जाए, तो उस विकास की समीक्षा जरूरी है।   आखिर कब सुनेगी व्यवस्था ग्रामीणों की पुकार? क्या घाटरी और अगावली के लोगों को स्वच्छ हवा, सुरक्षित मकान और स्वस्थ जीवन मिल पाएगा? यह सवाल अब प्रशासन और जिम्मेदार विभागों के सामने है।