भरतपुर न्यूज़ विकास के दावों के बीच अगावली बदहाल! पानी, श्मशान और रास्तों की समस्या से जूझ रहे ग्रामीण, क्रेशर की धूल और दरारों ने बढ़ाई चिंता भरतपुर/बयाना। विकास की चमकदार तस्वीरों के बीच भरतपुर के अगावली गांव की जमीनी हकीकत व्यवस्था के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि गांव आज भी पीने के पानी, बेहतर सड़कों, श्मशान घाट और कब्रिस्तान जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है। सवाल यह है कि जब विकास गांव-गांव पहुंचने का दावा किया जा रहा है, तो अगावली के लोग अब भी मूलभूत जरूरतों के लिए अधिकारियों के दरवाजे क्यों खटखटा रहे हैं?

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ग्रामीणों के मुताबिक, गांव में पेयजल की समस्या लंबे समय से बनी हुई है। गर्मी के दिनों में हालात और गंभीर हो जाते हैं। अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाट की व्यवस्था को लेकर भी ग्रामीणों में असंतोष है, जबकि मुस्लिम समुदाय के लिए कब्रिस्तान से जुड़ी समस्याएं भी लगातार उठाई जा रही हैं। गांव की कई सड़कें जर्जर हैं। न पर्याप्त इंटरलॉकिंग सड़कें हैं, न सीसी सड़कें और न ही बारिश के दौरान सुरक्षित आवागमन की सुविधा। बरसात में कीचड़ और जलभराव के कारण ग्रामीणों को रोजमर्रा के कामों के लिए भी परेशानी उठानी पड़ती है। सबसे बड़ी चिंता गांव के पास संचालित क्रेशर को लेकर सामने आ रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि क्रेशर से उड़ने वाली धूल और लगातार होने वाले कंपन ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। कुछ मकानों में बड़ी-बड़ी दरारें आने की बात भी ग्रामीणों ने कही है। उनका दावा है कि भय का माहौल इतना बढ़ गया है कि कई लोग रात में घरों के भीतर सोने से डरते हैं और खुले में रात बिताने को मजबूर हैं। हालांकि, मकानों में आई दरारों और क्रेशर संचालन के बीच संबंध की आधिकारिक पुष्टि तकनीकी जांच के बाद ही हो सकेगी। यही वजह है कि ग्रामीण निष्पक्ष जांच, सुरक्षा मानकों की समीक्षा और तत्काल प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं। अब सवाल सीधा है—क्या प्रशासन अगावली पहुंचेगा? क्या ग्रामीणों को सुरक्षित आवास, स्वच्छ वातावरण, पानी, सड़क और सम्मानजनक अंतिम संस्कार की सुविधाएं मिलेंगी? ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें आश्वासन नहीं, बल्कि समयबद्ध और स्थायी समाधान चाहिए। प्रशासन का पक्ष और जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद ही पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट होगी। फिलहाल अगवाली के ग्रामीणों की आवाज गांव की सीमाओं से निकलकर शासन-प्रशासन तक पहुंच चुकी है।