घाटरी में भूख हड़ताल का 16वां दिन, गूंजा “न्याय दो या मार दो” क्रेशर की धूल से दिल्ली तक प्रदूषण तो घाटरी में क्या हाल? ग्रामीणों का सवाल—“क्या हम जड़ी-बूटी खाते हैं?” भरतपुर। घाटरी में कथित अवैध खनन और क्रेशरों के खिलाफ ग्रामीणों का आंदोलन 16वें दिन भी जारी है। 30 जुलाई से एक बाबा भूख हड़ताल पर बैठे हैं। ग्रामीणों का कहना

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है कि लगातार उपवास के चलते उनके स्वास्थ्य और वजन को लेकर चिंता बढ़ रही है, लेकिन आंदोलनकारी मांगों पर डटे हैं। आज निठार ग्राम पंचायत के ग्रामीणों ने भी घाटरी के न्याय संघर्ष को समर्थन दिया। धरना स्थल पर “अवैध क्रेशर बंद करो, अवैध खनन बंद करो, घाटरी को न्याय दो” और “न्याय दो या मार दो” जैसे नारों से माहौल गूंज उठा। ग्रामीणों ने हालिया खनन हादसे का हवाला देते हुए सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए। आरोप है कि खनन और क्रेशर क्षेत्रों में मजदूरों के लिए पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम, हेलमेट और मास्क जैसी बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। ग्रामीणों का कहना है कि पशु भी आए दिन गहरे गड्ढों और भारी मशीनरी के कारण हादसों का शिकार हो रहे हैं। ग्रामीणों का सबसे बड़ा सवाल प्रदूषण को लेकर है। उनका कहना है कि दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण बढ़ने पर क्रशर गतिविधियों पर रोक लगती है और कई बार एक-डेढ़ महीने तक काम बंद रहता है। ग्रामीण सवाल करते हैं—“अगर क्रेशर की धूल दिल्ली तक पहुंच सकती है, तो 400 मीटर से लेकर 900 मीटर की दूरी पर बसे हमारे गांव का क्या हाल होगा? क्या हम कोई जड़ी-बूटी खाते हैं?” ग्रामीणों का आरोप है कि लगातार ब्लास्टिंग से मकानों में दरारें आई हैं। बारिश ने इन दरारों को और कमजोर कर दिया है। उनका दावा है कि एक मकान पहले ही गिर चुका है और तेज धमाकों के दौरान नए मकानों में भी कंपन व दरारें महसूस होती हैं। ग्रामीणों के मुताबिक ब्लास्टिंग के दौरान भय का माहौल इतना बढ़ जाता है कि लोग घरों से बाहर निकलकर पेड़ों के नीचे या खुले स्थानों में समय बिताने को मजबूर हैं। बारिश और कमजोर मकानों के बीच ग्रामीणों को किसी बड़े हादसे का डर सता रहा है। ग्रामीणों का आरोप—गांव संकट में है, लेकिन प्रशासन कुंभकरणी नींद में है। सवाल सीधा है—16 दिन की भूख हड़ताल और लगातार उठती शिकायतों के बाद प्रशासन आखिर कब जागेगा?